पिछले एक दशक में देश में करीब 89 हजार सरकारी स्कूल कम हुए हैं। वहीं, इसी अवधि में निजी स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई। यह बदलाव केवल स्कूलों की संख्या में परिवर्तन नहीं है, बल्कि भारत की स्कूली शिक्षा व्यवस्था में सरकारी और निजी क्षेत्र की बदलती भूमिका को भी दर्शाता है।
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उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में सरकारी स्कूलों के बंद होने या दूसरे स्कूलों में विलय की खबरों ने इस बहस को और तेज किया है। सरकारों की ओर से अक्सर कम छात्र संख्या को स्कूलों के विलय या पुनर्गठन का कारण बताया जाता है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या क्यों घट रही है? क्या परिवार तेजी से निजी स्कूलों की ओर जा रहे हैं या सरकारी स्कूलों की कमजोर होती व्यवस्था उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर रही है?
इन सवालों को समझने के लिए केवल स्कूलों की संख्या नहीं, बल्कि नामांकन, फीस, शिक्षा की गुणवत्ता और परिवारों की आर्थिक स्थिति जैसे पहलुओं को भी देखना जरूरी है।
वर्ष 2014-15 में देश में करीब 11.07 लाख सरकारी स्कूल थे। 2023-24 तक इनकी संख्या घटकर करीब 10.17 लाख रह गई।
यानी लगभग एक दशक में सरकारी स्कूलों की संख्या में करीब 89 हजार की कमी आई।
इसी अवधि में देश की आबादी में भी वृद्धि हुई। ऐसे में सरकारी स्कूलों के नेटवर्क में आई गिरावट शिक्षा की सार्वजनिक व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है।
मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में सरकारी स्कूलों की संख्या में बड़ी कमी दर्ज की गई।
दूसरी ओर, निजी स्कूलों की संख्या में वृद्धि हुई, जिससे स्कूली शिक्षा में निजी क्षेत्र की भूमिका मजबूत होने का संकेत मिलता है।
हालांकि, सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी के पीछे स्कूलों का विलय, पुनर्गठन, कम नामांकन और प्रशासनिक कारण भी हो सकते हैं। इसलिए इसे सीधे तौर पर केवल सरकारी शिक्षा से निजी शिक्षा की ओर पलायन का परिणाम मानना उचित नहीं होगा।
मुख्य आंकड़े
2014-15: 11.07 लाख सरकारी स्कूल
2023-24: 10.17 लाख सरकारी स्कूल
कमी: करीब 89 हजार स्कूल
सरकारी स्कूलों की संख्या में यह गिरावट ऐसे समय में हुई है, जब गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा की मांग लगातार बनी हुई है। इसलिए यह देखना जरूरी है कि स्कूलों की संख्या घटने का असर छात्रों की पहुंच और शिक्षा की गुणवत्ता पर कितना पड़ा है।
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एक समय था जब अच्छे बोर्ड परीक्षा परिणाम को उच्च शिक्षा में प्रवेश का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में प्रवेश प्रक्रिया में बड़ा बदलाव आया है। आज कई प्रमुख संस्थानों में प्रवेश के लिए अलग-अलग राष्ट्रीय या संस्थान-स्तरीय प्रवेश परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन करना जरूरी हो गया है।
कैसे कक्षा से कोचिंग सेंटर तक पहुंच गया प्रवेश का रास्ता?
केंद्रीय विश्वविद्यालयों और प्रमुख संस्थानों में प्रवेश के लिए CUET, JEE और NEET जैसी प्रवेश परीक्षाओं की भूमिका बढ़ी है।
उदाहरण के लिए, दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्नातक प्रवेश के लिए केवल बोर्ड परीक्षा के अंकों के आधार पर प्रवेश नहीं मिलता; उम्मीदवारों को CUET में प्रदर्शन करना होता है।
इंजीनियरिंग और मेडिकल शिक्षा में JEE और NEET जैसी परीक्षाएं पहले से ही प्रवेश प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
इन परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग और अतिरिक्त अध्ययन सामग्री का बाजार भी तेजी से बढ़ा है।
इससे उन छात्रों को लाभ मिल सकता है, जिन्हें बेहतर कोचिंग, डिजिटल संसाधन और परीक्षा की तैयारी के लिए अधिक समय एवं आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं।
इसके विपरीत, सीमित संसाधनों वाले छात्रों के लिए विद्यालयी शिक्षा के साथ अलग प्रवेश परीक्षा की तैयारी करना अतिरिक्त चुनौती बन सकता है।
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1. बोर्ड परीक्षा का परिणाम
अच्छे अंक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन कई प्रमुख संस्थानों में ये अकेले प्रवेश की गारंटी नहीं देते।
2. प्रवेश परीक्षा — CUET/JEE/NEET
कई संस्थानों में प्रवेश के लिए अलग प्रतिस्पर्धी परीक्षा में प्रदर्शन निर्णायक होता है।
3. अतिरिक्त तैयारी और कोचिंग
प्रवेश परीक्षा के पैटर्न के अनुरूप तैयारी के लिए अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता पड़ सकती है।
4. कॉलेज में प्रवेश
अंतिम प्रवेश संबंधित परीक्षा में प्रदर्शन, सीटों की उपलब्धता और लागू प्रवेश नियमों पर निर्भर करता है।
इस बदलाव ने उच्च शिक्षा में प्रवेश को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाया है। साथ ही, यह सवाल भी उठता है कि क्या सभी छात्रों को इन परीक्षाओं की तैयारी के लिए समान अवसर और संसाधन मिल रहे हैं।
हर तीन में से लगभग एक किशोर माध्यमिक शिक्षा तक नहीं पहुंच पाता
स्कूल ड्रॉपआउट रोकना लंबे समय से भारत की शिक्षा नीति की प्रमुख प्राथमिकताओं में रहा है। इसके बावजूद प्राथमिक स्तर से माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते छात्रों के नामांकन में बड़ी गिरावट दिखाई देती है।
68.5% — माध्यमिक स्तर (कक्षा 9–12) का सकल नामांकन अनुपात (GER)
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने वर्ष 2030 तक स्कूली शिक्षा में 100% GER हासिल करने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में माध्यमिक स्तर का GER 68.5% बताया जाता है। हालांकि, GER को सीधे तौर पर यह कहने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता कि 31.5% बच्चे स्कूल छोड़ चुके हैं। GER किसी आयु वर्ग की वास्तविक ड्रॉपआउट दर नहीं, बल्कि संबंधित स्तर पर कुल नामांकन का एक संकेतक है।
इसलिए उपलब्ध आंकड़ा यह जरूर बताता है कि माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच में बड़ी चुनौती बनी हुई है, लेकिन इसे सीधे तौर पर 'हर तीन में से एक किशोर स्कूल छोड़ देता है' कहना सांख्यिकीय रूप से सही नहीं होगा।
सकल नामांकन अनुपात (GER)
शिक्षा स्तर | GER |
प्राथमिक | 91% |
माध्यमिक (कक्षा 9–12) | 68.5% |
2030 का लक्ष्य | 100% |
प्राथमिक स्तर पर नामांकन अपेक्षाकृत अधिक है, लेकिन माध्यमिक स्तर तक आते-आते GER में उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। इसका अर्थ है कि माध्यमिक शिक्षा में पहुंच और निरंतरता बढ़ाने के लिए अभी भी महत्वपूर्ण प्रयासों की आवश्यकता है।
सरकारी स्कूलों की संख्या में कमी, निजी संस्थानों के विस्तार, प्रवेश परीक्षाओं की बढ़ती भूमिका और माध्यमिक शिक्षा में GER की चुनौती—ये सभी अलग-अलग मुद्दे हैं, लेकिन इनके बीच एक साझा प्रश्न जरूर है: क्या सभी छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समान अवसर मिल रहे हैं?
सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए सरकारी स्कूलों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पर्याप्त निवेश जरूरी है।
स्कूलों के विलय या पुनर्गठन के फैसलों में केवल छात्र संख्या ही नहीं, बल्कि स्थानीय आबादी, छात्रों की दूरी और शिक्षा तक पहुंच को भी ध्यान में रखना चाहिए।
प्रवेश परीक्षाओं के बढ़ते महत्व के बीच यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि आर्थिक स्थिति छात्रों के अवसरों को अत्यधिक प्रभावित न करे।
सरकारी स्कूलों के छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, डिजिटल संसाधन, करियर मार्गदर्शन और प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के पर्याप्त अवसर मिलने चाहिए।
माध्यमिक स्तर पर छात्रों को स्कूल में बनाए रखने के लिए आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक कारणों पर एक साथ काम करना होगा।
शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता हासिल करने का माध्यम नहीं है। यह देश के मानव संसाधन, उत्पादकता, नवाचार और सामाजिक विकास की बुनियाद है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था का मूल्यांकन केवल स्कूलों या कॉलेजों की संख्या से नहीं, बल्कि इस आधार पर भी होना चाहिए कि कितने छात्रों को गुणवत्तापूर्ण और किफायती शिक्षा तक वास्तविक पहुंच मिल रही है।
यदि भारत को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था, अनुसंधान और कुशल कार्यबल के क्षेत्र में आगे बढ़ना है, तो सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना, शिक्षा की लागत को नियंत्रित रखना और छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना जरूरी होगा।
आखिरकार, सवाल केवल यह नहीं है कि भारत में कितने स्कूल या कॉलेज हैं। असली सवाल यह है कि क्या हर बच्चे को अच्छी शिक्षा पाने का समान अवसर मिल रहा है?
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