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गुरु पूर्णिमा पर निबंध (Essay on Guru Purnima in hindi) - हिंदू संस्कृति में गुरु या शिक्षक को हमेशा से ही भगवान के समान स्थान दिया गया है। गुरु की महत्ता को इस बात से भी समझ सकते हैं कि हमारे देश में आषाढ़ माह की पूर्णिमा गुरु पूर्णिमा के नाम से समर्पित है। वैसे तो हर माह में पूर्णिमा आती है, लेकिन आषाण माह की पूर्णिमा विद्यार्थियों के लिए खास होताी है। गुरु पूर्णिमा पर चर्चा से पहले, हम गुरु को समझ लें कि गुरु क्या हैं, गुरु कौन हैं। गुरु शब्द में ‘गु’ का अर्थ है अंधकार और ‘रु’ का अर्थ है प्रकाश। अर्थात जो अज्ञान के अंधकार को मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाए, वही सच्चा गुरु होता है। प्राचीन काल में गुरुकुल परंपरा से लेकर वर्तमान में आधुनिक शिक्षण प्रणाली में गुरु का स्थान आज भी वही है जो शुरू में था। गुरु सिर्फ हमें विषय का ज्ञान ही नहीं देते बल्कि समाज में जीने, नैतिकता, अनुशासन और आदर्शों का पाठ भी पढ़ाते हैं।
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संत कबीर दास का दोहा गुरु की महिमा को बखूबी बताता है -
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
यह दोहा दो पंक्तियों में ही गुरु के महत्व को रेखांकित कर देता है। आइए अब गुरु को समर्पित पूर्णिमा यानी गुरु पूर्णिमा को जानते हैं कि आषाण माह की पूर्णिमा को हो ही गुरु पूर्णिमा क्यों मनाते हैं। यह दिन सभी शैक्षणिक और आध्यात्मिक गुरुओं को समर्पित एक परंपरा को संदर्भित करता है, जिन्हें विकसित या प्रबुद्ध व्यक्ति माना जाता है।
हिंदू पौराणिक (Hindu Mythology) कथाओं के अनुसार, भगवान शिव ने गुरु पूर्णिमा के दिन ही सप्तऋषियों या अपने सात अनुयायियों को अपना ज्ञान प्रदान किया था। इसी कारण, भगवान शिव को गुरु भी कहा जाता है और गुरु पूर्णिमा का दिन उनके और उनकी शिक्षाओं के सम्मान में मनाया जाता है। जैन पौराणिक कथाओं के अनुसार, जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर महावीर, अपने पहले अनुयायी को प्राप्त करने के बाद इसी दिन गुरु बने थे। इस प्रकार, जैन धर्मावलंबियों ने महावीर के सम्मान में यह उत्सव मनाया। दूसरी ओर, गौतम बुद्ध ने अपने ज्ञान प्राप्ति के पाँच सप्ताह बाद इसी दिन अपना पहला उपदेश दिया था। इसलिए, बौद्ध धर्मावलंबी गौतम बुद्ध के सम्मान में यह उत्सव मनाते हैं। गुरु पूर्णिमा के दिन ही महाभारत के रचयिता महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था इसलिए इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है
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गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जो हमारे शिक्षकों, अर्थात गुरुओं, के सम्मान में मनाया जाता है, जो हमारे मन के अंधकार को दूर करने में सहायता करते हैं। प्राचीन काल से ही गुरुओं का अपने अनुयायियों के जीवन में विशेष स्थान रहा है। शिष्य और गुरु के बीच के अद्भुत बंधन और गुरुओं के महत्व को सभी पवित्र ग्रंथों में वर्णित किया गया है। संस्कृत के 'माता, पिता गुरु दैवम्' के अनुसार, क्रमानुसार पहला स्थान माता का, उसके बाद पिता, गुरु और फिर ईश्वर का है। स्पष्टतः, हिंदू परंपरा में गुरु को देवताओं से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। शिष्य अपने गुरुओं का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए इस अवसर पर पूजा-अर्चना करते हैं। गुरु पूर्णिमा भारत, नेपाल और भूटान में रहने वाले हिंदू, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों द्वारा मनाई जाती है।
इस दिन, लोगों को गुरु की शिक्षाओं और सिद्धांतों का पालन करने और उनका पालन करने के लिए स्वयं को समर्पित करना चाहिए। गुरु पूर्णिमा पर कुछ नमूना निबंध यहां दिए गए हैं।
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गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसी दिन गुरु वेद व्यास की जयंती का दिन है, जिन्होंने सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक, महाभारत की रचना की थी। ऋषि व्यास या गुरु व्यास न केवल एक संत थे, बल्कि कौरवों के दरबारी सलाहकार भी थे, जिन्होंने कुरुक्षेत्र के महान युद्ध में पांडवों के विरुद्ध युद्ध लड़ा था।
यह दिन न केवल हिंदुओं द्वारा, बल्कि बौद्ध और जैन जैसे कई अन्य धर्मों द्वारा भी मनाया जाता है। इन दिनों में, लोग कई अनुष्ठान करते हैं और अपने गुरुओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं - एक ऐसे व्यक्ति जो उन्हें ज्ञान प्रदान करते हैं और उन्हें सही मार्ग पर ले जाते हैं, जिससे उन्हें जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने में मदद मिलती है।
गुरु पूर्णिमा भारत का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व है। यह प्रत्येक वर्ष आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, इसलिए इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत, पुराणों तथा वेदों के संकलन जैसे महान कार्य किए, इसलिए उन्हें आदिगुरु माना जाता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु का स्थान माता-पिता के समान ही महत्वपूर्ण माना गया है। गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और संस्कारों से शिष्य के जीवन को सही दिशा प्रदान करते हैं। वे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर करके ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। इसलिए कहा गया है— "गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः।"
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करते हैं और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। विद्यालयों, आश्रमों और विभिन्न शिक्षण संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लोग अपने गुरुओं का आशीर्वाद लेकर जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लेते हैं।
आज के समय में भी गुरु का महत्व उतना ही है जितना प्राचीन काल में था। एक अच्छा गुरु केवल शिक्षा ही नहीं देता, बल्कि अच्छे संस्कार, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी विकास करता है। हमें अपने गुरुओं का सदैव सम्मान करना चाहिए और उनके बताए मार्ग पर चलकर एक आदर्श नागरिक बनने का प्रयास करना चाहिए।
गुरु पूर्णिमा पर, जिन हिंदुओं ने दीक्षा प्राप्त की है और जिनके जन्म से ही गुरु हैं, वे अपने गुरुओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। जैन धर्मावलंबी त्रीनोक गुहा के पवित्र मंदिर (holy temple of Teernok Guha) में जाते हैं। जिन गुफाओं को अब मंदिरों में बदल दिया गया है, वे पवित्र स्थल माने जाते थे और प्राचीन काल में भक्तगण वहां आते थे। वहां वे विभिन्न प्रकार की धूप और पुष्प अर्पित करते हैं। शिष्य और भक्त चरणामृत (Charan Amarita) की प्रतीक्षा करते हैं, जिसे गुरुओं के चरणों से प्राप्त दिव्य अमृत माना जाता है। हिंदू धर्म इस रूप में अपने गुरुओं को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
गुरुओं की शिक्षाओं को आत्मसात करने के लिए मंदिरों/स्कूलों में बच्चों के लिए कला प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाती हैं। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि बच्चे त्योहारों की परंपरा से जुड़े रहें, जहाँ वे लिखते हैं, चित्रकारी करते हैं और विभिन्न प्रकार की कलाओं में संलग्न होते हैं। जैन धर्मावलंबी गुरु पूर्णिमा को त्रीनोक गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाते हैं, क्योंकि इस त्योहार को मनाने का उनका एक अलग तरीका है। इसके द्वारा, वे चातुर्मास, यानी चार महीने, की शुरुआत का प्रतीक हैं। इन चार महीनों में, जैन धर्मावलंबी महावीर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं, जो वर्षा ऋतु में चार महीने के एकांतवास पर निकलते हैं। वे तीर्नोक गुहा भी थे, क्योंकि वे गांधार बन गए थे। अन्य सभी धर्मों की तरह, जैन धर्म ने भी ज्ञान का प्रसार किया और प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के सच्चे अर्थ की खोज करने का उपदेश दिया।
गुरु पूर्णिमा एक ऐसा त्योहार है जो विद्यार्थियों को उनके जीवन में शिक्षकों की भूमिका की याद दिलाता है। गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर विद्यार्थी अपने गुरुओं के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। विभिन्न आश्रमों और यहाँ तक कि मंदिरों में भी गुरु पूर्णिमा अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं, जहाँ लोग आते हैं, अनुष्ठानों में भाग लेते हैं और अपने गुरुओं को पुष्पांजलि अर्पित करते हैं।
बौद्ध धर्मावलंबी गुरु पूर्णिमा का त्योहार भी मनाते हैं, जिसमें वे भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश का स्मरण करते हैं, जो उन्होंने सारनाथ, वाराणसी में दिया था। इसके अलावा, बौद्ध मठों में भिक्षु गहन ध्यान साधना भी करते हैं। गुरु पूर्णिमा की पूर्व संध्या पर, गुरु और शिष्य के बीच के संबंध का सम्मान किया जाता है और प्रतीकात्मक खीर भी बनाई जाती है।
इस त्योहार को सबसे पवित्र और आध्यात्मिक अवसर माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ईश्वर ने मानव जाति को वेदों का उपदेश देने के लिए गुरुओं को भेजा है, क्योंकि गुरुओं द्वारा दी गई शिक्षाओं, महान मूल्यों और विचारधाराओं का सभी द्वारा सम्मान किया जाता है। शिष्य अपने गुरुओं के प्रति पादपूजा नामक एक सामान्य अनुष्ठान करते हैं, जिसमें वे सम्मान दर्शाने के प्रतीक के रूप में गुरुओं के चरण और जूते धोते हैं।
गुरु पूर्णिमा के दिन शिष्यों द्वारा नृत्य, कीर्तन, पाठ और गीत जैसे कई कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि गुरु पूर्णिमा के दिन यदि शिष्य गुरु की पूजा करते हैं, तो उन्हें गुरु दीक्षा का पूर्ण फल प्राप्त होता है। यदि कोई व्यक्ति महान सफलता प्राप्त करना चाहता है, तो उसे एक अच्छे गुरु की खोज करनी चाहिए। आज भी गाँवों में शिक्षकों को गुरु जी कहा जाता है। शिक्षा के बिना सफलता प्राप्त करना बहुत कठिन है, और इसीलिए प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में गुरु का बहुत महत्व होता है।
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गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन हम अपने गुरुओं, आचार्यों और शिक्षकों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं तथा उनके ज्ञान और मार्गदर्शन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। ‘गुरु’ शब्द ‘गु’ (अंधकार) और ‘रु’ (नाश करने वाला) से मिलकर बना है, अर्थात् वह जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि इस दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था।
गुरु पर निबंध (Guru par nibandh) : ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
गुरु पूर्णिमा का संबंध हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों से है। हिंदू धर्म में इस दिन महर्षि वेद व्यास को विशेष पूजा जाता है, जिन्होंने वेदों का संकलन कर चारों वेदों, पुराणों और महाभारत की रचना की। वे आदिगुरु माने जाते हैं।
बौद्ध धर्म में यह दिन ‘धर्म चक्र प्रवर्तन दिवस’ के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपने पाँच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था और बौद्ध संघ की स्थापना की थी। जैन धर्म में भी गुरु पूर्णिमा को गुरुओं के सम्मान में मनाया जाता है।
भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊँचा स्थान दिया गया है। “गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः। गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥” इस श्लोक में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का रूप बताया गया है। गुरु ही शिष्य को अज्ञान से मुक्ति दिलाकर मोक्ष का मार्ग दिखाते हैं।
गुरु पूर्णिमा मनाने का तरीका
गुरु पूर्णिमा के दिन विद्यार्थी और शिष्य अपने गुरुओं के चरणों में पुष्पांजलि अर्पित करते हैं। स्कूलों, कॉलेजों और आश्रमों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को याद करते हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम, भजन-कीर्तन और प्रवचन होते हैं।
कई लोग इस दिन व्रत रखते हैं और गुरु मंत्र की दीक्षा लेते हैं। योग और आध्यात्मिक संस्थाएँ इस अवसर पर विशेष शिविरों का आयोजन करती हैं। घरों में भी छोटे बच्चे अपने माता-पिता और शिक्षकों को कार्ड बनाकर या फूल देकर सम्मान व्यक्त करते हैं।
गुरु पूर्णिमा की समसामयिक प्रासंगिकता
आज के आधुनिक युग में जहाँ तकनीकी शिक्षा पर जोर है, वहाँ गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि ज्ञान केवल किताबी नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और जीवन-मूल्यों वाला होना चाहिए। सच्चा गुरु केवल पढ़ाता नहीं, बल्कि शिष्य के चरित्र का निर्माण भी करता है। इस दिन हमें अपने शिक्षकों के प्रति कृतज्ञता के साथ-साथ समाज में गुरु-शिष्य संबंध को मजबूत करने का संकल्प भी लेना चाहिए।
गुरु पूर्णिमा केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि एक भाव है – कृतज्ञता का, सम्मान का और ज्ञान की प्यास का। इस दिन हम उन सभी गुरुओं को याद करते हैं जिन्होंने हमारे जीवन को आकार दिया। गुरु का सम्मान करना भारतीय संस्कृति की पहचान है। आइए, हम सब इस पावन अवसर पर अपने गुरुओं को प्रणाम करें और उनके दिखाए मार्ग पर चलने का संकल्प लें।
गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ!
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥”
इस लेख में नीचे गुरु पूर्णिमा पर निबंध 10 लाइन में लिखने का तरीका बताया गया है। इससे गुरु पूर्णिमा पर निबंध 10 लाइन (Guru Purnima Speech in hindi 10 lines) में लिखने में मदद मिलेगी।
हिंदी माह के आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है।
यह महर्षि वेद व्यास को समर्पित है, जिन्होंने वेदों का संकलन किया और महाभारत की रचना की।
"गुरु" शब्द संस्कृत से लिया गया है। इसका अर्थ है "आध्यात्मिक शिक्षक"।
गुरु पूर्णिमा भारत, नेपाल और भूटान में रहने वाले लोगों द्वारा मनाई जाती है।
हम अपने शिक्षकों और मार्गदर्शकों के मार्गदर्शन और सहयोग के लिए उनका सम्मान करने हेतु गुरु पूर्णिमा मनाते हैं।
बौद्ध धर्म के अनुयायी सारनाथ में भगवान बुद्ध के प्रथम उपदेश का उत्सव इस दिन मनाते हैं।
इस दिन, स्कूल और कॉलेज शिक्षकों के लिए समारोह आयोजित करते हैं।
यह हमारे जीवन में मार्गदर्शन और गुरुओं के महत्व को बढ़ावा देता है।
सम्मान के प्रतीक के रूप में, शिष्य पदपूजा करते हैं जहाँ वे गुरुओं के चरण और पादुकाएँ धोते हैं।
यह दिन गुरुओं या शिक्षकों के प्रति विनम्रता, कृतज्ञता और श्रद्धा के महत्व की याद दिलाता है।
इन्हें भी देखें-
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का एक पवित्र और महत्वपूर्ण त्योहार है। यह आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन हम अपने गुरुओं, आचार्यों और शिक्षकों का सम्मान करते हैं जिन्होंने हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाकर ज्ञान का मार्ग दिखाया। 'गुरु' शब्द 'गु' (अंधकार) और 'रु' (रोकने वाला) से मिलकर बना है, अर्थात् वह जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाता है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है क्योंकि इसी दिन महर्षि वेद व्यास का जन्म हुआ था।
ऐतिहासिक महत्व : गुरु पूर्णिमा का संबंध भगवान बुद्ध से भी है। इसी दिन भगवान बुद्ध ने अपने प्रथम पाँच शिष्यों को सारनाथ में पहला उपदेश दिया था, जिसे 'धर्मचक्र प्रवर्तन' कहा जाता है। हिंदू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मों में इस दिन का विशेष महत्व है।
महर्षि वेद व्यास ने चारों वेदों, पुराणों, महाभारत और अन्य ग्रंथों की रचना की। इन्हें गुरु माना जाता है। इसलिए इस पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन भारत में गुरु-शिष्य परंपरा अत्यंत मजबूत थी। शिष्य गुरु के आश्रम में रहकर विद्या, नैतिकता और जीवन कौशल सीखते थे।
गुरु का महत्व (Guru par nibandh)
भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊपर स्थान दिया गया है। एक प्रसिद्ध श्लोक है:
"गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वरः।
गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥"
गुरु हमें न केवल पुस्तकीय ज्ञान देते हैं बल्कि जीवन जीने की कला, नैतिक मूल्य, अनुशासन और सही-गलत का भेद सिखाते हैं। आधुनिक युग में भी शिक्षक, प्रोफेसर, कोच, मेंटर और माता-पिता सभी गुरु के रूप में पूजनीय हैं। बिना गुरु के मार्गदर्शन के जीवन दिशाहीन हो जाता है।
कैसे मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा
इस दिन छात्र अपने गुरुओं को प्रणाम करते हैं, उन्हें फूल, मिठाई, पुस्तकें या वस्त्र भेंट करते हैं। कई जगहों पर गुरु-पूजन, हवन, सत्संग और भजन-कीर्तन का आयोजन होता है। आश्रमों और मंदिरों में विशेष कार्यक्रम होते हैं। योग और ध्यान के अनुयायी भी इस दिन नए संकल्प लेते हैं। कुछ विद्यालयों और कॉलेजों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं जिसमें छात्र गुरु-महिमा पर भाषण, कविता और नाटक प्रस्तुत करते हैं।
आज के भौतिकवादी युग में गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि सच्चा ज्ञान और मूल्यवान मार्गदर्शन कितना आवश्यक है। गुरु का सम्मान केवल एक दिन का नहीं, बल्कि जीवन भर का होना चाहिए। हमें अपने शिक्षकों का आदर करना चाहिए और उनके बताए मार्ग पर चलकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए।
"गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
गुरु पूर्णिमा का पर्व हमें ज्ञान, श्रद्धा और कृतज्ञता का संदेश देता है। आइए हम सब इस दिन अपने गुरुओं को सादर नमन करें और उनके आशीर्वाद से जीवन को उज्ज्वल बनाएं।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु की महिमा बताने वाले संतों, कवियों और धर्मग्रंथों के कुछ प्रसिद्ध वचन इस प्रकार हैं:
1. संत कबीरदास
"गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥"
अर्थ: यदि गुरु और भगवान दोनों सामने खड़े हों, तो पहले गुरु को प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग दिखाते हैं।
2. संत कबीरदास
"गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिटै न दोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मिले न मोक्ष॥"
अर्थ: गुरु के बिना न ज्ञान प्राप्त होता है, न दोष दूर होते हैं और न ही मोक्ष की प्राप्ति होती है।
3. गुरु स्तोत्र
"गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥"
अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। गुरु ही साक्षात् परब्रह्म हैं, ऐसे गुरु को प्रणाम है।
4. संत तुलसीदास
"बंदउँ गुरु पद कंज, कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज, जासु बचन रविकर निकर॥"
अर्थ: मैं उन गुरु के चरणकमलों को प्रणाम करता हूँ, जो कृपा के सागर और मनुष्य रूप में भगवान हैं। जिनके वचन अज्ञान के अंधकार को सूर्य की किरणों की तरह दूर कर देते हैं।
5. संत कबीरदास
"सब धरती कागद करूँ, लेखनी सब बनराय।
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय॥"
अर्थ: यदि पूरी धरती कागज बन जाए, सारे वन कलम बन जाएँ और सातों समुद्र स्याही बन जाएँ, तब भी गुरु के गुणों का वर्णन पूरा नहीं किया जा सकता।
6. आदि शंकराचार्य
"ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः, पूजामूलं गुरोः पदम्।
मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं, मोक्षमूलं गुरोः कृपा॥"
अर्थ: गुरु का स्वरूप ध्यान का आधार है, उनके चरण पूजा का आधार हैं, उनके वचन मंत्र हैं और उनकी कृपा ही मोक्ष का मूल है।
7. संत रविदास
"गुरु ज्ञान दीपक दिया, बाती दई जलाय।
रविदास हरि भगति करन, जनम-मरन मिटाय॥"
अर्थ: गुरु ज्ञान का दीपक जलाते हैं, जिससे भक्ति का मार्ग प्रकाशित होता है और जन्म-मरण के बंधन समाप्त होते हैं।
8. स्वामी विवेकानंद
"गुरु वह है जो आपके भीतर छिपी हुई शक्ति को पहचानने और उसे जागृत करने में आपकी सहायता करे।"
9. स्वामी शिवानंद
"गुरु केवल ज्ञान नहीं देते, वे शिष्य के जीवन को दिशा और उद्देश्य भी प्रदान करते हैं।"
10. महाभारत (गुरु महिमा)
"आचार्यात् पादमादत्ते, पादं शिष्यः स्वमेधया।
पादं सब्रह्मचारिभ्यः, पादं कालक्रमेण च॥"
अर्थ: विद्यार्थी एक चौथाई ज्ञान गुरु से, एक चौथाई अपनी बुद्धि से, एक चौथाई सहपाठियों से और शेष समय के साथ अनुभव से प्राप्त करता है।
ये सभी वचन गुरु पूर्णिमा के अवसर पर गुरु के महत्व, ज्ञान, मार्गदर्शन और जीवन में उनके अमूल्य योगदान को दर्शाते हैं।
महत्वपूर्ण प्रश्न :
गुरु पूर्णिमा कब है (Guru Purnima Kab hai)?
वर्ष 2027 में गुरु पूर्णिमा 18 जुलाई 2027, रविवार को है।
मुख्य तिथियां और मुहूर्त (नई दिल्ली के अनुसार):
पूर्णिमा तिथि आरंभ: 17 जुलाई 2027, शाम 06:48 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त: 18 जुलाई 2027, रात 09:14 बजे
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