दुनिया में अनेक प्रसिद्ध कवि हुए हैं, जिनकी अपनी-अपनी विशेषताएं हैं। यदि मुझसे पूछा जाएं कि मेरा प्रिय कवि कौन है? तो मेरा उत्तर होगा-महाकवि तुलसीदास। यद्यपि तुलसी के काव्य में भक्ति-भावना प्रधान है, परन्तु उनका काव्य सैकड़ों वर्षों के बाद भी भारतीय जनमानस में रचा-बसा हुआ है और उनका मार्ग-दर्शन कर रहा है, इसलिए तुलसीदास मेरे प्रिय कवि और साहित्यकार हैं।
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गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा (रामभक्ति शाखा) के सर्वोच्च और सबसे प्रभावशाली कवि-संत हैं। वे एक महान भक्त, कवि, समाज-सुधारक और दार्शनिक थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं से राम-भक्ति को जन-जन तक पहुंचाया और हिंदी साहित्य को अमरत्व प्रदान किया। उन्हें महर्षि वाल्मीकि का अवतार भी माना जाता है।
तुलसीदास का जन्म संवत 1589 (ईस्वी 1532) में श्रावण मास शुक्ल सप्तमी को अभुक्त मूल नक्षत्र में हुआ। जन्म स्थान के बारे में मतभेद हैं, लेकिन अधिकांश विद्वान उत्तर प्रदेश के बाँदा जिले के राजापुर गाँव को उनका जन्मस्थान मानते हैं (कुछ सोरों, एटा को भी कहते हैं)।
पिता: आत्माराम दुबे (या राजपति दुबे)
माता: हुलसी (या हुलसी देवी)
बचपन का नाम: रामबोला (जन्म के समय ही "राम" उच्चारण करने के कारण)
बचपन में ही माता-पिता का देहांत हो गया, इसलिए वे अनाथ हो गए। गुरु नरहरिदास (या बाबा नरहरिदास) से दीक्षा ली और शिक्षा प्राप्त की। युवावस्था में विवाह हुआ, पत्नी का नाम रत्नावली था। तुलसीदास अपनी पत्नी से अत्यधिक आसक्त थे। एक बार रत्नावली अपने भाई के साथ मायके (पिता के घर) चली गईं। तुलसीदास को यह वियोग असहनीय लगा।
एक तूफानी रात में वे नदी (सरयू या यमुना) पार करने के लिए निकले। नाव न मिलने पर उन्होंने एक बहती लाश को लकड़ी समझकर पकड़ा और नदी पार की। फिर घर की दूसरी मंजिल पर चढ़ने के लिए एक साँप को रस्सी समझकर पकड़ लिया और पत्नी के कमरे में पहुंचे।
जब उन्होंने यह रोमांचक वर्णन सुनाया, तो रत्नावली बहुत क्रोधित हुईं और उन्होंने कड़ी फटकार लगाई:
"अस्थि-चर्म मय देह मम, तामे ऐसी प्रीति।
तैसी जो श्रीराम सों, बन जाती कछु रीति॥"
(अर्थ: यदि इस हाड़-मांस की देह से इतना प्रेम है, तो यदि श्रीराम से आधा भी प्रेम होता तो भव-सागर से पार हो जाते।)
पत्नी की फटकार ("लाज न आई आपको दौरे आएहु नाथ") ने उनके जीवन को बदल दिया। इन शब्दों ने तुलसीदास के हृदय को झकझोर दिया। उन्हें वैराग्य हुआ, उन्होंने गृहस्थ जीवन त्याग दिया और पूर्णतः राम-भक्ति में लीन हो गए। इसी घटना को उनके रामभक्त बनने का प्रमुख कारण माना जाता है, जिसके बाद उन्होंने श्रीरामचरितमानस, हनुमान चालीसा आदि महान रचनाएँ कीं।
उन्होंने अधिकांश जीवन काशी (वाराणसी), अयोध्या और चित्रकूट में बिताया। वे संकटमोचन हनुमान मंदिर (वाराणसी) के संस्थापक माने जाते हैं। तुलसी घाट (गंगा किनारे) का नाम उनके नाम पर है। उनका देहांत संवत 1680 (ईस्वी 1623) में काशी में हुआ। उनका जीवन 112 वर्षों का था, जो त्याग, साधना और लोक-कल्याण से भरा रहा।
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तुलसीदास ने 12 मुख्य प्रमाणिक रचनाएं कीं (कुल 30+ रचनाएं मिलती हैं, लेकिन ये सबसे प्रसिद्ध हैं):
श्रीरामचरितमानस — उनकी सर्वश्रेष्ठ और विश्व-प्रसिद्ध कृति। अवधी भाषा में रामायण का महाकाव्य (1574-1576 ई. में रचित)। सात कांड: बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड, लंकाकांड, उत्तरकांड।
हनुमान चालीसा — 40 चौपाइयों वाली हनुमान-स्तुति, आज भी करोड़ों लोग रोज पढ़ते हैं।
विनय पत्रिका — राम को समर्पित 279 पदों की भक्ति-पत्रावली (स्तुति और विनय)।
कवितावली — राम-कथा पर कवित्त छंद में।
गीतावली — राम-लीला पर पद्य-गीत।
दोहावली — दोहों का संग्रह, नीति और भक्ति से भरा।
कृष्ण-गीतावली — कृष्ण-भक्ति पर।
पार्वती-मंगल, जानकी-मंगल, रामलला नहछू — मंगल-गीत।
बरवै रामायण, वैराग्य संदीपनी, रामाज्ञा प्रश्न आदि।
तुलसीदास की कविताओं में भक्ति, नीति, समाज-सुधार और दार्शनिक गहराई का अद्भुत समन्वय है। मुख्य विशेषताएं :
भक्ति भाव — सगुण भक्ति (राम को साकार ईश्वर मानकर)। राम को परब्रह्म, मर्यादा पुरुषोत्तम और आदर्श मानव के रूप में चित्रित किया।
भाषा-शैली — अवधी (रामचरितमानस), ब्रजभाषा और खड़ी बोली का मिश्रण। सरल, जन-सुलभ, लयबद्ध और प्रभावशाली। मुक्त छंद नहीं, बल्कि छंदबद्ध (दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त आदि)।
भाव पक्ष — राम-भक्ति, मर्यादा, कर्तव्य, परिवार, समाज और राज्य के आदर्श। पाखंड, अंधविश्वास और अन्याय पर प्रहार।
कला पक्ष — अलंकारों (उपमा, रूपक, अनुप्रास) का सुंदर प्रयोग। प्रकृति-चित्रण जीवंत। राम-कथा को भारतीय संस्कृति के साथ जोड़ा।
सामाजिक दृष्टि — समाज में व्याप्त कुरीतियों (जातिवाद, अंधभक्ति) का विरोध। राम-राज्य का आदर्श प्रस्तुत किया — "राम राज बैठे त्रैलोका, हरषित भए गए दुख रोका"।
दार्शनिक पक्ष — निर्गुण और सगुण का समन्वय, भक्ति को सर्वश्रेष्ठ मार्ग बताया।
तुलसीदास ने रामायण को संस्कृत से जन-भाषा में लाकर आम जनता तक पहुंचाया। रामचरितमानस आज भी उत्तर भारत में राम-लीला, कीर्तन और धार्मिक जीवन का आधार है। महात्मा गांधी ने इसे "सर्वश्रेष्ठ भक्ति साहित्य" कहा। वे हिंदी साहित्य के "आकाश के परम नक्षत्र" हैं।
तुलसीदास की वाणी आज भी प्रेरणा देती है:
"जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति देखी तिन तैसी।"
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